हाँ कहने को इंसान है हम


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हाँ कहने को इंसान है हम
हाँ कहने को इंसान है हम,
देल्ली, बदायूँ, कानपुर, मुम्बई…
जैसे शहरों को करते यूं बदनाम है हम,
हाँ कहने को इंसान है हम |

जिस नारी की आत्म रक्षा ओर सम्मान को,
रक्षा बंधन, भैया दूज, करवा चोथ जैसे त्योहार मानते है,
उस नारी की आबरू को करते यूं तार तार हैं हम,
हाँ कहने को इंसान है हम |

कभी नज़रो से, कभी शब्दो से …
ओर ना जाने किन किन हटकन्दो से,
हर रोज, हर पल….
करते नारी का अपमान हैं हम,
हाँ कहने को इंसान है हम |

ना जाने कितनी दामिनी ओर निर्भाया….
यू बनाते चले जेया रहे हैं हम,
नारी शब्द के असली मायेने यूं बदलते जा रहे है हम,
मा, बहन, बेटी, बीवी, दोस्त जैसे रिस्तो की आड़ मे,
हैवानियत को छुपाये जेया रहे हैं हम,
हाँ कहने को इंसान है हम |

इंसानियत, अछाई, सम्मान जैसे शब्दो की सचाई …..
क्या कभी किताबो से बाहर ला पायेंगे हम,
नारी शब्द के असली मायेने….
आकाश से भी उपर ले जा पायंगे हम,
दम घुटने वाली कैद से …..
खुली हवा मे सांसे दिला पायेंगे हम,

बातों मे नहीं हकीकत मे कभी ….
क्या इंसान बन पायेंगे हम,
क्या इंसान बन पायेंगे हम |